क्या तुम्हें लगता है कि जीवन तुम्हारे साथ घट रहा है? क्या तुम खुद को हालात का मारा एक बेचारा इंसान समझते हो जो एक सूखी पत्ती की तरह हवाओं के रहम पर यहां-वहां उड़ रहा है? अगर ऐसा है तो तुम बहुत गहरी नींद में हो। जागो। मैं तुम्हें याद दिलाने आया हूं कि तुम इस नाटक के कोई छोटे-मोटे पात्र नहीं हो। तुम ही लेखक हो, तुम ही निर्देशक हो और तुम ही वह मंच हो जिस पर यह पूरा अस्तित्व नाच रहा है।
जरा सोचो, जब तुम रात को सपना देखते हो तो उस सपने में शेर भी होता है और उससे डरने वाला तुम भी। सपने के भीतर शेर तुम्हें मारने दौड़ता है, तुम पसीना-पसीना हो जाते हो। लेकिन जब सुबह आंख खुलती है तो तुम पाते हो कि शेर भी तुम ही थे और डरने वाला भी तुम ही थे। सपने की पूरी दुनिया - पहाड़, नदियां, लोग, दुश्मन, दोस्त - सब तुम्हारे ही मन का फैलाव था।
यह जो खुली आंखों से तुम दुनिया देख रहे हो, जिसे तुम जागृत अवस्था कहते हो, यह भी एक बड़ा सपना ही है। फर्क सिर्फ इतना है कि यह सपना सामूहिक है। हम सब मिलकर इसे देख रहे हैं। लेकिन इस सपने का निर्माण तुम हर पल कर रहे हो।
विज्ञान अब जाकर उस बात को कह रहा है जो पूर्व के मनीषियों ने हजारों साल पहले कह दी थी - दृष्टा ही दृश्य को बनाता है। जब तक तुम किसी चीज को नहीं देखते, वह तरंगों के रूप में होती है। जैसे ही तुम्हारी नजर उस पर पड़ती है, वह ठोस हकीकत बन जाती है।
इसका मतलब है कि यह दुनिया पहले से बनी-बनाई नहीं रखी है। तुम इसे अपनी नजर से, अपने भाव से हर पल गढ़ रहे हो। अगर तुम उदास हो तो तुम्हें पूरा अस्तित्व उदास नजर आएगा। और अगर तुम भीतर से आनंद में हो तो तुम्हें कांटों में भी सुरक्षा नजर आएगी। दुनिया वैसी नहीं है जैसी वह है। दुनिया वैसी है जैसे तुम हो।
पहली बात जो तुम्हें समझनी है वह यह है कि संयोग जैसा कुछ नहीं होता। जीवन में कुछ भी अचानक नहीं घटता। तुम एक चुंबक हो। तुम्हारी चेतना की जो स्थिति है, वैसी ही घटनाओं को, वैसे ही लोगों को तुम अपनी ओर खींचते हो।
तुम्हारे जीवन में जो भी व्यक्ति है, जो भी परिस्थिति है, उसे तुमने ही निमंत्रण दिया है। शायद तुम्हें याद नहीं कि कब बुलाया, शायद तुमने अपने अवचेतन मन की गहराइयों से पुकारा था। लेकिन बुलाया तुमने ही है।
तुम पूछोगे - मैं अपने लिए दुख क्यों बुलाऊंगा? क्योंकि तुम्हारे भीतर बचपन से यह बात बिठा दी गई हो कि पैसा कमाना बहुत मुश्किल है या रिश्ते दर्द देते हैं। यह विचार, यह धारणा एक बीज की तरह तुम्हारे भीतर पड़ी है। अब तुम बाहर कितनी भी मेहनत कर लो, वह भीतर का बीज अपनी हकीकत को पैदा करेगा ही।
यह जो एकता का नियम है, इसे समझ लो - इस पूरे अस्तित्व में दो नहीं है। द्वैत सिर्फ भ्रम है। हम सब एक ही ऊर्जा का विस्तार हैं। जैसे समुद्र में लहरें उठती हैं - एक लहर ऊंची है, एक छोटी है। लेकिन दोनों सिर्फ पानी हैं। थोड़ी देर में दोनों वापस समुद्र में गिर जाएंगी।
तुम उसी विराट समुद्र का हिस्सा हो। नहीं, हिस्सा कहना भी गलत है। तुम वही विराट समुद्र हो जो एक छोटी सी लहर के रूप में खुद को अनुभव कर रहा है। जब तुम किसी दूसरे को चोट पहुंचाते हो तो तुम वास्तव में खुद को ही चोट पहुंचा रहे होते हो।
कर्म कोई बही-खाता नहीं है। यह सब बच्चों को डराने की बातें हैं। कर्म तो बस एक गूंज है, एक इको है। तुम कभी पहाड़ों पर गए हो? किसी घाटी में जाकर जोर से चिल्लाओ। अगर तुम चिल्लाओगे "मैं तुम्हें मार डालूंगा" तो पहाड़ गूंजेंगे - "मार डालूंगा, मार डालूंगा।" चारों तरफ से वही आवाज लौटकर आएगी।
और अगर तुम चिल्लाओगे "मैं तुमसे प्रेम करता हूं" तो चारों दिशाओं से प्रेम की वर्षा होने लगेगी। जीवन ठीक यही घाटी है। यहां तुम जो फेंकते हो वही हजार गुना होकर लौट आता है।
अगर तुम्हें लगता है कि दुनिया तुम्हें धोखा दे रहा है, तो ठहर जाओ। बाहर मत देखो, अपने भीतर झांको। कहीं न कहीं तुमने खुद को धोखा दिया है। वह जो भीतर का चोर है, वही बाहर के चोरों को, बेईमानों को अपनी ओर खींच रहा है। समान ही समान को आकर्षित करता है।
तुम शिकायत करना छोड़ दो। जिस दिन तुमने शिकायत छोड़ दी और जिम्मेदारी उठा ली, उसी दिन तुम्हारी जिंदगी में क्रांति घट जाएगी। यह एक बहुत बड़ा साहस है - यह कहना कि मैं जिम्मेदार हूं। अगर मैं दुखी हूं तो यह मेरा सृजन है। अगर मैं नरक में हूं तो यह मेरा निर्माण है।
और अगर मैं अपने लिए नरक बना सकता हूं तो मैं ही अपने लिए स्वर्ग भी बना सकता हूं। यह सूत्र तुम्हारे हाथ में चाबी थमा देता है। जब तक तुम जिम्मेदारी दूसरे पर डालते रहोगे, तुम गुलाम रहोगे। लेकिन खुद को - खुद को तो तुम अभी इसी क्षण बदल सकते हो।
तुम्हारे विचार कोई साधारण हवा के झोंके नहीं हैं। विचार वस्तुएं हैं। तुम जो सोचते हो वह ईंट-पत्थर की तरह ही असली है। बल्कि ईंट-पत्थर से ज्यादा असली है। क्योंकि ईंट तो टूट भी जाएगी, लेकिन एक विचार जो तुमने सदियों पहले किया था, वह आज भी तुम्हारी आत्मा के साथ चिपका हो सकता है।
जैसे कुम्हार मिट्टी से बर्तन बनाता है, वैसे ही तुम विचारों और भावनाओं से अपनी दुनिया बनाते हो। लेकिन समस्या यह है कि तुम्हारे विचार शुद्ध नहीं हैं। वे विरोधाभासी हैं। एक तरफ तुम चाहते हो कि तुम अमीर बन जाओ और उसी समय मन के किसी गहरे कोने में तुम अमीरों को गाली भी देते हो। अब अस्तित्व क्या करे? तुम एक्सीलरेटर और ब्रेक दोनों एक साथ दबा रहे हो।
सृजन का पहला सूत्र है कृतज्ञता। जो है पहले उसका उत्सव मनाओ। अगर तुम्हारे पास एक सूखी रोटी भी है तो उसे ऐसे खाओ जैसे तुम किसी सम्राट के भोज में बैठे हो। जैसे ही तुम तृप्त महसूस करते हो, अस्तित्व मजबूर हो जाता है तुम्हें और समृद्धि देने के लिए।
भरा हुआ और भर दिया जाएगा। खाली से वह भी छीन लिया जाएगा जो उसके पास है। यह जीसस का वचन है और बड़ा कीमती है। अगर तुम भीतर से खाली हो तो तुम बाहर का पूरा साम्राज्य पाकर भी भिखारी ही रहोगे।
तुम अकेले नहीं हो। तुम एक विशाल अदृश्य जाल से जुड़े हो। हम सब मनुष्यों की जड़ें एक हैं। तुम अपने कमरे में बैठकर अगर एक बुरा विचार भी करते हो तो तुमने उस जहर की एक बूंद पूरी मानवता के सामूहिक कुएं में डाल दी। तुम जिम्मेदार हो।
और इसी तरह अगर तुम अपने भीतर शांति का एक भी पल पैदा करते हो तो तुमने पूरी मानवता की मदद की। तुम्हारी वह शांति किसी दूर देश में बैठे किसी दुखी इंसान को भी ठंडक पहुंचाएगी। इसे मैं कहता हूं असली सेवा।
इच्छा छोड़ दो और संकल्प को जगाओ। इच्छा भिखारी की होती है, संकल्प राजा का होता है। इच्छा में संदेह होता है - मिलेगा या नहीं पता नहीं। संकल्प का अर्थ है एक निःशंक बोध - यह हो ही गया।
तुम्हें जो चाहिए उसे ऐसे देखो जैसे वह तुम्हें मिल ही चुका है। इसे एहसास के तल पर जियो। अगर तुम्हें स्वस्थ होना है तो बीमारी की बात मत करो। अपनी आंखें बंद करो और देखो कि तुम दौड़ रहे हो, तुम हंस रहे हो। उस एहसास को इतना गहरा कर लो कि तुम्हारा शरीर कंफ्यूज हो जाए कि हकीकत क्या है।
जीवन एक लीला है। खेल में हार भी होती है, जीत भी होती है। लेकिन जो खिलाड़ी है वह हारने पर रोता नहीं और जीतने पर पागल नहीं होता। वह खेल का मजा लेता है। तुम रचयिता हो तो तुम नाटक क्यों नहीं रच सकते?
सुबह उठते ही आईने में देखकर खुद से कहो - आज का दिन एक उत्सव है। आज मैं किसी बात से परेशान नहीं होऊंगा। आज मैं हर चीज में, हर व्यक्ति में उस एक ही परमात्मा की झलक देखूंगा। शुरुआत में यह तुम्हें अभिनय लगेगा। लगने दो, करते रहो। धीरे-धीरे यह अभिनय तुम्हारी आदत बन जाएगा और एक दिन यह आदत तुम्हारा स्वभाव बन जाएगी।
समय का भ्रम तोड़ दो। तुम सोचते हो कि जब मेरे पास पैसे आएंगे तब मैं खुश रहूंगा। यह भविष्य का धोखा है। कल कभी नहीं आता। जो भी है, अभी है। अगर खुश होना है तो अभी होना पड़ेगा। शर्तें लगाना बंद करो। सम्राट कहता है - मैं खुश हूं इसलिए ऐसा हो रहा है।
तुम उस विराट अस्तित्व का एक लघु रूप हो। तुम्हारे भीतर सूरज है, चांद है, तारे हैं। तुम्हारे भीतर पूरा आकाश समाया हुआ है। अपनी गरिमा को पहचानो। तुम अमृत के पुत्र हो। तुम उस परमात्मा का ही विस्तार हो।
जब यह बात तुम्हारी हड्डियों में उतर जाती है कि मैं और मेरा स्रोत एक है, तब तुम्हारे जीवन से भय हमेशा के लिए विदा हो जाता है। उठो, अपनी तुलिका उठाओ। यह दुनिया एक कोरा कैनवास है। इस पर प्रेम के रंग, आनंद के रंग, करुणा के रंग भरो। तुम स्वतंत्र हो। चाबी तुम्हारे हाथ में है। जंजीरें भी तुम्हारी हैं, और हथौड़ा भी तुम्हारा है। सृष्टि के रचयिता तुम स्वयं हो।