जीवन भर हम भागते रहते हैं, योजनाएं बनाते हैं, मकान खड़े करते हैं। लेकिन क्या कभी रात की गहराई में सच्ची शांति महसूस होती है? नहीं। एक खालीपन है जो भरता नहीं। एक बेचैनी है जो सोने नहीं देती। हम सोचते हैं कि सफलता अगले मोड़ पर है, बस थोड़ा और धन, थोड़ा और नाम। पर वह 'फिर' कभी आता नहीं।
हकीकत यह है कि हमारी समस्या बाहर नहीं, बहुत गहरी है। हम एक ऐसे मकान में रह रहे हैं जिसका किराया कभी चुकाया ही नहीं। जन्म के साथ ही कुछ कर्जे हम पर चढ़ जाते हैं। यह बैंक का कर्ज नहीं, अस्तित्व का कर्ज है। प्राचीन ऋषियों ने इसे 'ऋण' कहा और बताया कि जब तक यह नहीं चुकता, जीवन संघर्षपूर्ण रहेगा।
पहला कर्ज है देव ऋण। देव का अर्थ है प्रकाशमान शक्तियां जो सिर्फ देना जानती हैं। सूरज रोज निकलता है, हवा सांस देती है, धरती अन्न उगलती है। क्या इन्होंने कभी हमसे बिल मांगा? हमारा शरीर 70% पानी है, बाकी मिट्टी, हवा, आग और आकाश। हम इन्हीं पांच तत्वों से बने हैं। हमारी हर सांस उधार है।
जब देव ऋण बाकी रह जाता है तो शरीर साथ छोड़ने लगता है। अकारण बाधाएं आती हैं और जीवन से रस सूख जाता है। इस कर्ज से मुक्ति का उपाय है कृतज्ञता। सुबह उठकर सूरज को धन्यवाद दें। पक्षियों को दाना डालें, पेड़ लगाएं। प्रकृति का शोषक नहीं, पोषक बनें।
दूसरा कर्ज है ऋषि ऋण। हम जो भी जानते हैं, सब उधार है। भाषा, विज्ञान, कला – सब हमें विरासत में मिला है। हजारों वर्षों की तपस्या का फल हमें मुफ्त में मिल गया। जब हम ज्ञान का सम्मान नहीं करते, तो निर्णय लेने की क्षमता खो देते हैं। वाणी प्रभावहीन हो जाती है और हम मूर्खतापूर्ण परंपराओं के गुलाम बन जाते हैं।
इस कर्ज से मुक्ति का मार्ग है स्वाध्याय और दान। जो ज्ञान मिला है उसे जीवन में उतारें। क्रोध को क्षमा में बदलें। और सबसे महत्वपूर्ण – ज्ञान को बांटें। किसी को तैरना सिखाएं, किसी गरीब बच्चे को पढ़ाएं। विद्या का दान ही ऋषि ऋण चुकाने का एकमात्र तरीका है।
तीसरा और सबसे गहरा कर्ज है पितृ ऋण। हम आसमान से नहीं टपके। हजारों पीढ़ियों का संघर्ष, प्रेम और जीजीविषा हमारे भीतर सांस ले रही है। हमारे डीएनए में हमारे पूर्वजों की अधूरी इच्छाएं, उनके भय, उनके सपने सब कुछ रिकॉर्ड है।
जब पितृ ऋण खराब होता है तो संतान संबंधी कष्ट आते हैं, घर में कलह होती है। मुक्ति का सूत्र है स्वीकार भाव। अपने माता-पिता को वैसे ही स्वीकार करें जैसे वे हैं। उन्हें माफ कर दें। जीवित माता-पिता की सेवा करें और अपनी संतान को अच्छे संस्कार दें।
ये तीन कर्ज हमारे भाग्य के दरवाजे पर ताले हैं। देव ऋण चुकता है संवेदना और सेवा से। ऋषि ऋण चुकता है स्वाध्याय और ज्ञान बांटने से। पितृ ऋण चुकता है प्रेम और अच्छी परवरिश से। यह कोई कर्मकांड नहीं, 24 घंटे जीने की साधना है।
जब हम इस भाव दशा में आते हैं कि हम ऋणी हैं और हमें चुकाना है, तो हमारा अहंकार पिघलने लगता है। जहां अहंकार नहीं होता, वहीं परमात्मा का प्रवेश होता है। जब हम देने वाले बन जाते हैं, तो अस्तित्व हमें और देता है। यह नियम है।
सफलता हमारे पीछे दौड़ती आएगी, हमें उसके पीछे नहीं भागना पड़ेगा। बस हमें कृतज्ञता, प्रेम और जागरूकता की ओर मुंह करना है। जागो, क्योंकि समय बहुत कम है और कर्ज बहुत पुराने हैं। लेकिन चुकाने की क्षमता हममें है। हम बीज हैं और हमारे भीतर पूरा जंगल छिपा है। बस खिलने की देरी है।
THanks for sharing. Amazing Article.
Glad you liked Priya.
Thanks Osho, for motivating us.
God blessed you.