मुंबई का एक 20 कमरों का घर। सूरत में फार्महाउस। Rolls Royce, Bentley, Lamborghini का कलेक्शन। घर में 15 से ज्यादा स्टाफ। यह थी हीत ढोलकिया की रोज़मर्रा की जिंदगी - डायमंड किंग सव्जी ढोलकिया के सबसे छोटे बेटे। लेकिन एक दिन उन्हें बिना एक रुपए के, बिना स्मार्टफोन के, बिना अपना सरनेम बताए - घर से निकाल दिया गया।
यह सजा नहीं थी। यह उनकी सबसे बड़ी ट्रेनिंग थी।
23 साल पहले लंदन के एक रेस्टोरेंट में जब परिवार के बच्चों ने बिना प्राइस देखे पापड़ ऑर्डर किया, तो बिल में 3 पाउंड का पापड़ देखकर काका को झटका लगा। बच्चों की गलती नहीं थी - उन्हें कभी पैसे की कीमत जाननी नहीं पड़ी थी। उसी दिन एक परंपरा की नींव पड़ी। हरे कृष्णा एक्सपोर्ट्स के आठ भाइयों में से हर एक को एक महीना बाहर जाकर चार अलग-अलग जॉब करनी थी - बिना पैसे, बिना पहचान, बिना सरनेम।
हीत आठवें और आखिरी थे।
गैंगटक पहुंचते ही पहले दिन फ्लाइट में एक अनजान दीदी मिलीं जिन्होंने माला देखकर ₹2000 और लिफ्ट दोनों दे दिए। रात को Domino's में जॉब मांगने गए तो शटर बंद करके पुलिस बुला ली गई। पुलिस स्टेशन में मार भी पड़ी। और यह सब पहले ही दिन।
जब परिवार ने फोन पर वापस आने को कहा, हीत ने एक ही बात बोली - अब एक्सट्रीम अच्छा और एक्सट्रीम बुरा दोनों देख लिया। अब जो होगा देखा जाएगा। वापस नहीं जाना।
पहली जॉब शेर-ए-पंजाब रेस्टोरेंट में बतौर वेटर मिली। रहने की जगह इतनी खराब थी कि ब्लैंकेट की जगह बैग में रखा शॉल था और सूटकेस थैला तकिया बना। 10-12 लोग एक कमरे में, ठंड में धुएं की बदबू के साथ।
दूसरी जॉब एक ज्वेलरी शॉप में मिली - जहां उन्हें लगा सोफिस्टिकेटेड काम होगा, लेकिन दो दिन सफाई करवाई गई। उसी दुकान में हमारी अपनी कंपनी की ज्वेलरी सजी थी, यह देखकर मन में अजीब सी फीलिंग आई।
तीसरी जॉब में सबसे अनमोल दोस्त मिला - राहुल, जो फिजिकली और मेंटली चैलेंज्ड था। वो चल नहीं सकता था, बोल नहीं सकता था, लेकिन हर दिन सुबह 9 बजे दुकान में पहुंच जाता था। अपनी पिज्जा की चार स्लाइस में से एक हमेशा हीत के लिए रखता था। और हमेशा खुश रहता था।
First half में खुद का धंधा शुरू किया। थर्मस खरीदा, चाय की व्यवस्था की और MG Market में घूमते हुए बेचने लगे। डायलॉग एक ही था - "ठंडी में पियो गरमा गरम चाय, अदरक इलायची वाली, सिक्किम मिल्क वाली।"
पहले दिन ₹750 की चाय बिकी।
फिर एक बिहारी दीदी मिलीं जो अकेले तीन बच्चे पालती थीं। उन्होंने पैसे लेने से मना कर दिया - बोलीं "मैं अपनी मेहनत का खाऊंगी, तू अपनी मेहनत का खा।" उस दिन चाय बेचना बंद कर दिया। दीदी की रोजी पर असर नहीं डालना था।
फिर एक शू बॉक्स में छेद किए, लैमिनेटेड मेन्यू बनाया और शुरू हो गया आइसक्रीम का धंधा। पूरे मार्केट में भाग-भागकर ऑर्डर लेते और तुरंत डिलीवर करते। एक दिन Axis Bank के एक अधिकारी ने उनकी मेहनत देखकर ₹17,000 Paytm कर दिए।
एक महीने में हीत ने जाना कि पैसे की असली कीमत क्या होती है। घर का स्टाफ किन हालात में रहता है। अकेले एक अनजान शहर में खुद को साबित करने का मतलब क्या होता है। और सबसे बड़ी बात - दुनिया में बुरे लोगों से ज्यादा अच्छे लोग हैं। वही बात जो पापा ने विदाई के वक्त कही थी।
खाली हाथ गए थे। ₹18,000 कमाकर लौटे। और जो अनुभव लेकर आए, वो किसी कीमत पर नहीं मिल सकते।
अगर कभी पापा या अंकल कल कह दें कि "निकल जाओ घर से" - अब डर नहीं। यही सबसे बड़ी कमाई है।