Zero से Billionaire: Diamond King Savji Dholakia के 5 सूत्र

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एक गांव का लड़का। मां का सपना। 18 साल की उम्र। और एक अटूट विश्वास कि एक दिन वो बड़ा बनेगा। यही थी Savji Dholakia की शुरुआत - वही सव्जी भाई जिनके नाम आज 1260 से ज्यादा कारें और 400 से ज्यादा फ्लैट अपने कर्मचारियों को गिफ्ट करने का रिकॉर्ड दर्ज है। जिनकी कंपनी हरे कृष्णा एक्सपोर्ट्स का सालाना टर्नओवर 7000 करोड़ से ऊपर है। और जिनके बेटे की शादी में खुद प्रधानमंत्री आए थे।

लेकिन यह सफलता किसी किस्मत का खेल नहीं थी। यह एक सोच की ताकत थी।

द सीक्रेट और एक पुराना विश्वास

सव्जी भाई ने द सीक्रेट बुक पढ़ी - इंग्लिश में समझ न आई तो 17 बार वो मूवी देखी। जब वो बुक पढ़ी तो एहसास हुआ कि जो वो बरसों से जी रहे थे, बुक उसी की पुष्टि कर रही थी। विजुअलाइजेशन, पॉजिटिव सोच, लक्ष्य पर टिके रहना - यह सब उन्होंने पहले जिया, बाद में पढ़ा।

2002 में उन्होंने लिख दिया था - 5 साल में सूरत में नंबर वन, 10 साल में इंडिया में नंबर वन, और 2027 तक दुनिया में नंबर वन। आज वो उस रास्ते पर हैं। 100 करोड़ का एक्सपोर्ट लिखा था, आज 15,000 करोड़ का एक्सपोर्ट है। यही होती है लिखे हुए सपने की ताकत।

पांच सूत्र जिन्होंने जिंदगी बदली

पहला सूत्र है - आई एम द बेस्ट। मैं श्रेष्ठ हूं। यह ओवर कॉन्फिडेंस नहीं, यह आत्मविश्वास है। बेस्ट सोच भी, बेस्ट काम भी, बेस्ट देना भी, बेस्ट इंसान भी। बेस्ट की कोई सीमा नहीं होती।

दूसरा सूत्र है - आई कैन डू इट। मैं कर सकता हूं। यह एक लाइन उनकी ऑफिस की दीवार पर लिखी है। जो टेक्नोलॉजी आई, जो नया बिजनेस आया, जो नई चुनौती आई - जवाब एक ही था: आई कैन डू इट।

तीसरा सूत्र है - गॉड इज ऑलवेज विथ मी। भगवान हमेशा साथ हैं। जब यह भरोसा हो तो गलत सोचने की भी हिम्मत नहीं होती। यह सूत्र सिर्फ बोलने का नहीं, जीने का है।

चौथा सूत्र है - आई एम द विनर। मैं विजेता हूं। कितनी बार भी गिरो, पछतावा मत रखो, कल की बात को याद मत रखो।

और पांचवां सूत्र है - टुडे इज माय न्यू डे। आज मेरा नया दिन है। भूतकाल में मत रहो। आज से नई शुरुआत।

कार गिफ्ट - जब देना बन गया मार्केटिंग

1995 में जब उनके पास Fiat थी, उन्होंने अपने कर्मचारियों को Maruti 800 गिफ्ट की। अपने आप से यह सवाल कभी नहीं किया कि जो गाड़ी मेरे पास नहीं, वो दे रहा हूं। कारण साफ था - देने की खुशी लेने की खुशी से बड़ी होती है।

500 कारें गिफ्ट करने का जो इवेंट था, उसमें जो कर्मचारी क्वालीफाई नहीं हुए थे उनके बच्चों ने पूछा - पापा, आपको नहीं लगी? पिता ने कहा - बेटा, अगले साल हमारा नंबर है। और अगले साल उसने करके दिखाया। वो जो प्रतिस्पर्धा, वो जो जुनून जागा - वो किसी ट्रेनिंग प्रोग्राम से नहीं आता।

लंच की छोटी सोच, बड़ा बदलाव

25 साल पहले उन्होंने कर्मचारियों के लिए फैक्ट्री में ही लंच की व्यवस्था की। लोगों ने कहा - बजट नहीं बैठेगा। लेकिन फायदे अनगिनत हुए। एक घंटा बचा, यानी 10% सैलरी बढ़ी। घर पर खाना नहीं था तो कर्जा कम हुआ। पत्नी को समय मिला। दोपहर की हीरों की चोरी बंद हुई। और सबसे बड़ा - मानसिकता बदली। जो बदलाव 100 साल में नहीं आता, वो लंच की एक आदत ने ला दिया।

गुजराती माइंडसेट का राज

191 भारतीय बिलेनियर्स में से 108 गुजरात से हैं। क्यों? जवाब सरल है - हार्ड वर्क और देने की भावना। स्मार्ट वर्क वाला भाड़े पर मिल जाता है। लेकिन जो मेहनत दिल से करे और जो देने में विश्वास रखे - वो दुनिया बदल देता है।

एक ही संदेश

जो करना है उसे 24 घंटे आंखों के सामने रखो। लक्ष्य मत बदलो। समय आने दो। पैसा कमाने का उद्देश्य सिर्फ पैसा नहीं - समाज के लिए, परिवार के लिए, राष्ट्र के लिए क्या करोगे, यह विज़न क्लियर रखो।

सव्जी भाई ने यह विज़न 18 साल की उम्र में देखा। और पूरी जिंदगी उसी पर चलते रहे।


FAQ

उन्होंने ₹179 की मासिक तनख्वाह पर डायमंड पॉलिशिंग से शुरुआत की थी। तीन महीने में ही वो ₹1600 प्रति माह तक पहुंच गए थे।

आई एम द बेस्ट, आई कैन डू इट, गॉड इज ऑलवेज विथ मी, आई एम द विनर और टुडे इज माय न्यू डे — ये पांच सूत्र हैं जो उन्होंने जिए हैं।

उनका मानना था कि एक आम आदमी का सबसे बड़ा सपना अपनी कार होना है। कार देने से कर्मचारी का मोटिवेशन और समर्पण इतना बढ़ जाता है जो किसी ट्रेनिंग से नहीं आता।

सव्जी भाई के अनुसार हार्ड वर्क और देने की भावना - यही दो चीजें गुजरातियों को बिजनेस में आगे रखती हैं। स्मार्ट वर्क बाद में भाड़े पर मिल सकता है।

बुक पढ़कर उन्हें एहसास हुआ कि जो वो बरसों से कर रहे थे वो सही था। इसने उनके विश्वास को और मजबूत किया और उन्होंने अपने कर्मचारियों को भी यह बुक गिफ्ट की।

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