ज़रा ठहरिए। वहीं ठहर जाइए जहाँ आप हैं। आप एक बड़ी भूल में जी रहे हैं। जिसे आप अब तक एक शब्द समझते आए हैं, जिसे आप मंदिर की घंटी या किसी पूजा का हिस्सा मानते आए हैं, वह कोई शब्द नहीं है। वह किसी इंसान द्वारा बनाई गई ध्वनि भी नहीं है।
वह वह गूंज है जो तब भी मौजूद थी जब यह दुनिया नहीं बनी थी। जब न सूरज था, न चाँद था, न धरती थी—तब भी यह आवाज़ अस्तित्व में गूंज रही थी। और आश्चर्य की बात यह है कि आज आपका विज्ञान, आपका नासा भी उसी निष्कर्ष तक पहुँच रहा है, जहाँ हजारों साल पहले ऋषियों ने छलांग लगाई थी
आज का आदमी, जिसे तुम आधुनिक आदमी कहते हो, वह दरअसल एक बीमार आदमी है। तुम सुबह उठते हो और उठते ही तुम्हारे दिमाग में विचारों की एक भीड़ शुरू हो जाती है। यह करना है, वह पाना है, उससे लड़ना है।
क्या तुमने कभी गौर किया है - तुम्हारे भीतर कितना शोर है? अगर मैं तुम्हारी खोपड़ी को खोलकर तुम्हारे विचारों को लाउडस्पीकर पर लगा दूं तो तुम खुद अपनी ही आवाज सुनकर पागल हो जाओगे।
तुम एक घर नहीं हो, तुम एक सराय बन गए हो जहां हर कोई आता है, शोर मचाता है और चला जाता है। और इस शोर का नतीजा क्या है? तनाव, चिंता, भय। आज हर दूसरा व्यक्ति भीतर से कांप रहा है।
तुमने कभी सोचा है कि एक पेड़ इतना शांत क्यों होता है? एक पहाड़ इतना मौन, इतना स्थिर क्यों है? क्योंकि वे अस्तित्व के साथ एक लय में हैं। वे उसी संगीत से जुड़े हुए हैं जो इस पूरे ब्रह्मांड में बज रहा है।
और तुम - तुम बेसुरे हो गए हो। तुम उस संगीत से टूट गए हो। तुम एक अलग ही राग अलाप रहे हो - अहंकार का राग, 'मैं' का राग। और यही तुम्हारे सारे दुखों का कारण है।
लोग उसे ओम कहते हैं। लेकिन रुकना - जैसे ही तुम ओम सुनते हो, तुम्हारे मन में एक छवि बन जाती है किसी मंदिर की, किसी सन्यासी की। बस यहीं तुम चूक गए।
ओम कोई हिंदू शब्द नहीं है। जैसे पानी हिंदू नहीं होता, जैसे हवा मुस्लिम नहीं होती, जैसे सूरज ईसाई नहीं होता, वैसे ही ओम किसी धर्म का नहीं है। ओम तो अस्तित्व की धड़कन है।
आज का तुम्हारा भौतिक विज्ञान क्या कहता है? जब उन्होंने परमाणु को तोड़ा तो वे हैरान रह गए। वहां कोई ठोस चीज नहीं थी, वहां सिर्फ ऊर्जा थी, सिर्फ कंपन था।
और जहां कंपन है, जहां गति है, वहां ध्वनि होगी ही - यह विज्ञान का नियम है। तो अगर यह पूरा अस्तित्व कंपन कर रहा है तो इसका मतलब है कि यह पूरा अस्तित्व एक ध्वनि कर रहा है।
नासा ने जब सूर्य की आवाज रिकॉर्ड की, जब उन्होंने ब्रह्मांड के खाली अंधेरे की आवाज रिकॉर्ड की, तो वे भी हैरान रह गए। वह आवाज वैसी ही थी जैसा कि प्राचीन ग्रंथों में लिखा है - एक भिनभिनाहट, एक गूंज।
अब तुम पूछोगे - अगर यह आवाज हर जगह है तो हमें सुनाई क्यों नहीं देती? कारण साफ है - तुम बहरे हो। तुम्हारे कान तो ठीक हैं, लेकिन तुम्हारा ध्यान ठीक नहीं है।
तुम अपने भीतर के शोर में इतने उलझे हुए हो कि बाहर का संगीत तुम्हें सुनाई ही नहीं पड़ सकता। तुम्हारे दिमाग का शोर, तुम्हारी चिंताओं का शोर - इन सब ने मिलकर इतना कोलाहल मचा रखा है कि तुम्हारे भीतर जो ओम लगातार बज रहा है, वह दब गया है।
तुम लोग जिसे ओम कहते हो, तुम उसे गलत बोलते हो। तुम कहते हो "ओम"। नहीं, यह शब्द नहीं है। इसमें तीन ध्वनियां हैं जो मिलकर एक बनती हैं - अ, उ, म।
यह सिर्फ अक्षर नहीं हैं। यह तुम्हारे अस्तित्व के तीन तल हैं:
आधुनिक विज्ञान अब कहता है - वेगस नर्व, जो तुम्हारे दिमाग से दिल और पेट तक जाती है, जब तुम तनाव में होते हो तो यह गलत संकेत भेजने लगती है।
प्राचीन ऋषियों को वेगस नर्व नाम नहीं पता था, लेकिन वे इसके काम को जानते थे। वे जानते थे कि अगर कंठ में एक विशेष कंपन पैदा किया जाए तो यह नाड़ी शांत हो जाती है। और जैसे ही यह शांत होती है, तुम्हारा पूरा शरीर गहरे विश्राम में चला जाता है।
सुबह का वक्त चुनो जब सूरज उग रहा हो। पेट खाली हो। सुखासन में बैठ जाओ - रीढ़ सीधी, हाथ घुटनों पर, आंखें कोमलता से बंद।
एक गहरी सांस लो और फिर एक ही लय में - अ-उ-म। हिस्से मत करना। यह एक बहती हुई नदी है। 'अ' धीरे-धीरे 'उ' में बदल जाए, 'उ' धीरे-धीरे 'म' में बदल जाए, और 'म' अंत में सन्नाटे में बदल जाए।
ऋषियों ने पाया है कि 11 बार एक जादुई आंकड़ा है। पहली तीन-चार बार में तुम सिर्फ गला साफ कर रहे होते हो। पांचवी-छठी बार में शरीर शांत होने लगता है। सातवीं बार के बाद असली जादू शुरू होता है। 11वीं बार तक तुम गायब हो जाते हो, सिर्फ गूंज रह जाती है।
जब तुम 11वीं बार ओम बोलकर चुप हो जाओ, तब तुरंत उठकर भाग मत जाना। वही तो असली खजाना है। जब ध्वनि खत्म होती है तो पीछे गहरा सन्नाटा छूट जाता है। उस सन्नाटे में डूब जाना।
उस पल में तुम्हारे भीतर कोई विचार नहीं होगा। तुम्हें अपनी असली झलक मिलेगी। तुम्हें पता चलेगा कि तुम कौन हो - तुम यह शरीर नहीं हो, तुम यह मन नहीं हो। तुम वह साक्षी हो जो इस सबको देख रहा है।
आज से, अभी से एक संकल्प लो - तुम अपने दिन के 24 घंटों में से सिर्फ 15 मिनट इस अस्तित्व को दोगे। शुरुआत में तुम्हें लगेगा कि कुछ नहीं हो रहा। लेकिन भरोसा रखना। बीज जमीन के नीचे पनपता है, दिखाई नहीं देता, लेकिन काम चल रहा होता है।
यह विज्ञान तुम्हारे सामने है। अब यह तुम्हारी हिम्मत है कि तुम निवाला उठाते हो या भूखे ही मर जाते हो। चुनाव तुम्हारा है।